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नमो नमः। (Namo namaḥ
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सप्ताहात् प्रच्युतो मातुरुदरात् कुपितो यतः । हैहयेन्द्रमुपावृत्तमपराध्यन्तमुद्धतम् ॥८॥
॥ शब्दच्छेदः - शब्दार्थः ॥ सप्त अहात् प्रच्युतः मातुः उदरात् कुपितः यतस् । हैहय इन्द्रम् उपावृत्तम् अपराध्यन्तम् उद्धतम् ।।८।।
यह श्लोक मार्कण्डेय पुराण (सप्तदशोऽध्यायः - 17.8) से लि या गया है
। यह अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया क े गर्भ से उत्पन्न दुर्वासा मुनि के जन्म के संदर्भ में आता है
 
  • यह श्लोक मार्कण्डेय पुराण (सप्तदशोऽध्यायः - 17.8) से लिया गया है। यह अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया के गर्भ से उत्पन्न दुर्वासा मुनि के जन्म के संदर्भ में आता है
    • सप्ताहात् प्रच्युतो मातुरुदरात् कुपितो यतः ।हैहयेन्द्रमुपावृत्तमपराध्यन्तमुद्धतम् ॥८॥
    • पदच्छेद (Word-by-Word):
    • सप्ताहात् (एक सप्ताह में), प्रच्युतो (उत्पन्न/बाहर निकला), मातुः (माता के), उदरात् (पेट/गर्भ से), कुपितो (क्रोधित), यतः (क्योंकि);

      हैहय-इन्द्रम् (हैहयवंशी राजा - कार्तवीर्य अर्जुन को), उपावृत्तम् (आते हुए), अपराध्यन्तम् (अपराध करते हुए), उद्धतम् (घमंडी)
    • अर्थ: चूंकि वे (दुर्वासा) गर्भधारण के एक सप्ताह बाद ही माता के पेट से कुपित होकर बाहर निकले थे, इसलिए वे क्रोधी स्वभाव के हुए। बाहर निकलते ही उन्होंने घमंडी और अपराधी हैहय राजा (कार्तवीर्य अर्जुन) को अपनी ओर आते देखा।
    • संदर्भ: यह दुर्वासा ऋषि के जन्म की कथा है, जिन्हें रुद्रांश (शिव का अंश) माना जाता है।वे गर्भवास के कष्ट से असंतुष्ट थे, इसलिए शीघ्र ही बाहर निकल आए और अपने प्रचंड क्रोधी स्वभाव के कारण जाने गए
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